चलती रही मैं, बहती रही मैं
कल कल करती नदी विकल मैं
बहती तपती शांत शीतल मैं
चलती रही मैं, बहती रही मैं
हर रूप हर स्वाभाव की मैं
तोडा हर मिथक को मैंने
रास्ते मेरे स्वतः बने
चट्टानों सी दृढ धरती
बाहें फैलाये हरी हुई
मेरे मंद स्वारित जीवन में
जाने कितने काँकड़ छोड़े
टूट गई मेरी मौन समाधि
लहर बन अश्रु फूट पड़े
कल कल करती नदी विकल मैं
सहती रही मैं, हर दुःख को समेटे चलती रही मैं
सबकी अपनी एक व्यथा है
हर जुबाँ कीएक कहानी है
समाहित मेरे जीवन में,
उनकी सांसो की तपिश हुई.
कौन है,किसको सुनाऊ आपबीती
है मेरे अपने भी कुछ सपने,कुछ आशाएं
उफनती लहर में अश्रु वेग से निकल पड़े
पुकारती मैं उस गहराई को
सिमट कर जिसमे भूल जाऊ मैं अपनी पहचान
हर दुःख, हर मन की पीड़ा पी
परहित मैं शीतल मंद बयार बनी
कल कल करती नदी विकल मैं
बढती रही,सागर के पास, पुकारती चली मैं...
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