Search This Blog

Sunday, January 9, 2011

कुछ नया तो नहीं है आज
ये काली घटाये, ये रिमझिम सा सावन
हर बार भिगोता, चला जाता
ऐसा क्या है इस बार, ये फुहार
रेशमी सी मेरे मन को भाती
कभी काँटों सी लगती थी
कभी भीगने से डरते थे
मन मयूर खुल के नाचना चाहता है
तितलिया क्यों मेरे आस पास ही  मंडरा रही
ये तपता सूरज क्यों बख्श रहा है ठंडी छावं

गुनगुनाती हवा मिठास घोलती कानो में,
रूह को छू के गुजर रही है
सब कुछ इतना प्यारा पहले तो न लगा था
जादुई सा सब कुछ, राज़ है कोई इनमे छुपा
मेरे मन की हलचल है या तुने किया है कोई इशारा
इतना मेहरबान है ये जहाँ,
इतनी बेताबी पहले तो नहीं हुई
क्यों इतनी शिद्दत से तेरी कमी महसूस हो रही है
हौसले पस्त न हो मेरे ,आ जाओ
अकेलेपन ने खौफज़दा कर दिया है मुझे
शायद इसी का नाम चाहत है
जब मेरे ही मन पे मेरा इख्तियार  नहीं
तस्सवुर में तुम्ही छाये हो
तेरा ही सहर है ये, बिन तेरे खाली है जीवन
कि ख्वाब ने तेरे, मेरे ज़ात को फ़रामोश कर दिया है
बेमानी है तेरे बिना ज़िन्दगी मेरी
बेरंग बेरौनक है ये दुनिया जब तू न संग हो
सनसनाती hawao की ताजगी में तेरी ही गुफ्तगू है
कह रही है ये भी शायद मुझे सिर्फ तेरी जुस्तजू है...

No comments:

Post a Comment