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Tuesday, September 20, 2011

खुशियों की रुखसती

कितनी आसान लगी थी ज़िन्दगी हमें,
दूर बैठकर जब अंदाज़ा लगाया करते थे
मखमली अहसास,रंगीनियों भरे मौसम पुकारा करते थे
अनजान थी इन मुश्किलों से,जो राह में कब से मेरे ही मुन्तजिर थे..
 हौसले पस्त मेरे,चिरागों के मन में भी अँधेरा घर कर गया ..
 ढूढती हू रेत के ज़र्रो में पानी का सोता
खुशियों को छानने की कोशिश में धुल फाकते है अब,
सोचा न था कभी ऐसा भी होगा
आसमान में छाया काला धुआ दामन बदनुमा कर गया..
तफसील की चाहत में मिली है रुस्वाइयाँ हमें,
मोमिन की तरह पिघलते दिल को पत्थर की मूरत कर गया..
ऐसा न था कि हम उन्हें मन नही पाते
 नतीजो के खौफ ने चुप रखा हमें,
तकाजा हमें भी हो चूका है मोहब्बत का 
ग़म सिर्फ हार का नहीं,आज जीत भी ग़मगीन कर गया..
तस्सव्वुर में मेरे साथ चलते थे वो,
आज तो साया भी रुखसत कर गया..

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