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Tuesday, September 27, 2011

जाने क्यों

पता नहीं ये क्या है,
कौन सी डोर बांधे है मुझे तुझसे
क्यों लगता है आस पास ही है तू,
देखता कही से मुझे
एक निगाह तुझ पे डाल के  निकल जाती हु
वो दो पल ही सारे ज़माने की खुशिया दे जाते है..
 पता नहीं ये क्या है,
छिटक जाती है चारो ओर खुशिया
सोचती हु जब तुझे दिल के किसी कोने में बैठा है तू
झंकार सी होती है दिल में ,
हर तरफ मोती से बिखर जाते है..
पता नहीं ये क्या है,
  बात करने के लिए बचा नहीं  कुछ भी
लेकिन बाते ख़तम नहीं होती,
सुनना चाहती हु,जी भर के सुनाना चाहती हु
लिखना चाहती हु नगमे छेड़ के दिल के तार को
समझ के मेरी बेचैनी ये टिमटिमाते तारे भी गुनगुना जाते है..
क्यों तेरी हर एक अदा भाती है मुझे
रूठती हु हर छोटी बात पे
क्यों हर बार तेरा मनाना अच्छा लगता है
सुनती हु तुझे कितनी बार
साँसों में घुल के सरगम की तरह बहती है
होती हु तन्हा फिर भी, होंठ हौले से मुस्कुरा जाते है..
तेरी छोटी छोटी बाते सबको बताना
तेरे कहने से पहले सब कुछ समझ जाना
क्यों तेरे साथ न होने पर ढूढती हु तुझे साए की तरह,
छोड़ना नहीं चाहती वो हाथ जो तुने थमाया भी नहीं
जुदा होने के ख्याल भी ग़मज़दा कर जाते है.. 

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