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Monday, October 25, 2010

माँ

तुझे समझ पाना कितना मुश्किल और आसान है कितना
तेरा निश्छल प्रेम
प्रकृति कि सुरम्य घाटी बनकर
हूर सा एहसास करा जाता
कभी तेरे ममता के सागर में मन मेरा गोते लगाता
न समझ पाई तेरी प्रकृति
नारी एक, अंश तेरी फिर भी
एक बूँद मेरे लहू की लाली
भर देते क्यों तेरे दृगो में पानी
हर जुल्मो सितम को सह कर हसना मुझे सिखाया
कभी माँ, कभी बहन कभी हमराज़ बन
हर राह हर कदम पर तुझे साथ पाया
सिखाकर मुझे दुनिया की रीति
बताया मुझे क्या है सच्ची प्रीती
न समझ पाई तेरी प्रकृति
क्यों बदल जाती है नारी बनाकर
अपनी सी एक नन्ही कृति......

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