आज जी चाहता है की तुम पर कुछ लिखू
बता दू जग को क्या हो तुम मेरे लिए
जाने कितनी इच्छाएं, जाने कितनी बातें
उमड़ रही है मन में बताने के लिए
लहर सी उठ रही, सब कुछ बहाने के लिए
समेत लू मैं वो हर लम्हा,जब सोचा सिर्फ तेरे लिए
वक़्त कम पड़ जायेया या कि थम जायेगा
जब यादों कि देहलीज़ पर अक्स तुम्हारा दिखे...
शब्द कम पड़ेंगे तुम्हारे एहसासों को समाने के लिए
हर लम्हा, हर वाकया, जो तुम्हारे साथ का मिला
नसीब कि शुक्रगुजार..जीने कि हर निशाँ
हर वो बात जो तुम्हारी जुबान से निकला
रत सा गया है बचपन में सीखे अंको अक्षरों सा
धमनियों में दौड़ता बनकर लहू पूरे तन में
जुदा दिल से,मस्तिष्क से;
जब होती परेशान तो सिर्फ एकबार तुम्हारा
सामने होना ही विजय का पल होता
भगवन से करती प्रार्थना तो होठो पर
जाने क्यों माँ पापा के साथ तुम्हारा नाम अत...
तुम्हे क्या मुझे खुद भी नहीं पता, क्या हो तुम मेरे लिए
भगवन ने नहीं दिया था अग्रज कोई
क्योकि दिल का वो कोना सुरक्षित था तुम्हारे लिए
दे दो मुझे भी अनुजा का हक जताने के लिए....
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