क्या कहू
किससे कहू
बरसने को आतुर है आँखों के मेघ
पर उस पर भी रोक निर्निमेष
कही बंज़र,कही दलदल
कही बरसने को जी चाहता
तो कही रेट बनना मज़बूरी है
ये जटिलता नहीं, द्वेष है मेरा
ठहराव मज़बूरी है
कही जंगल देखकर फिर जाती है नज़र
क्योकि कंक्रीट के जंगल में नहीं मंगल
कही बंज़र देखकर भी नहीं बरसता
बंज़र नहीं,भावनाओ का है ये मंज़र.....
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