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Monday, October 25, 2010

चाहत चकोर की

फिर दौड़ चला है मेरा मन उस ओर
बखयाली की दुनिया में बसेरा बसाये
कुछ तो चल रहा जिस पर नहीं कोई अख्तियार
हर सुबह अहम् का इंतज़ार करती है
और शाम टकटकी लगाये बैठी है आस्मां की ओर
चुपके से घटाओ की ओट से निकला चाँद
कुछ लजाता, कुछ शर्माता,इठलाता
जरा भर के गुरुर सा आँखों में
सैर पर निकला है वो बेखबर उन निगाहों से
पड़ गए जिनमे जाले से
तरसती एक झलक को आस्मां को ताकती चकोर
दिन रैन खयालो की चादर बुनती वो
दीदार को तडपती,टीसती रहती
अनजान नादाँ वो नहीं जानती वफ़ा की उल्फियत
वफ़ा निभाती चकोर ने चाँद को कभी बेवफा न कहा
दूर उसकी सलामती की दुआएं मांगते दो हाथ
न आखिर उसकी चाहत का,न कोई छोर
भीड़ में हसती तन्हाई में गुसुम सी वो
न कोई शिकवा न गिला किसी से
मायने ही अलग है उसके लिए मोहब्बत के
चाहत पाने का नहीं लुटाने का नाम है
अश्कों में बहती बेताबी नहीं है आशिकी
अनजान चाँद को सलामत रखती इश्क की यही डोर.....

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